जल संसाधन
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अधीनस्थ संगठन

केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र

पुणे के नजदीक खड़कवासला स्‍थित केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र हाइड्रोलिक अनुसंधान के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय स्‍तर का उत्कृष्‍टता केंद्र है। 1916 में सिंचाई और ड्रेनेज की जुड़वां समस्‍याओं को देखने वाले एक संस्‍थान के रूप में शुरुआत से आज यह हाइड्रोलिक अनुसंधान के मामले में अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त संस्‍थान बन गया है। संस्था के जनादेश में बुनियादी अनुसंधान आधारित विशेष अनुसंधान की बात कही गई है। जल संसाधन, बिजली और जल परिवहन से संबंधित परियोजनाओं को यह केंद्र अनुसंधान और विकास आधारित समग्र सहयोग उपलब्ध कराता है।

अपने कार्य क्षेत्र के विभिन्न विषयों पर संस्थान अपने सेवाग्राहकों को परामर्श और सलाह सेवा उपलब्ध कराता है। जल संसाधन से जुड़ी संस्थाओं को अपनी विशेषज्ञता और अनुसंधानों के परिणामों का लाभ प्रदान करने के लिए यह इन कार्यों में संलग्न संस्थाओं के मानव संसाधन को प्रशिक्षण भी प्रदान करने का कार्य करता है। वर्ष 1971 से एशिया प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक और सामाजिक अनुसंधान की प्रयोगशाला के तौर पर केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र ने पड़ोसी देशों के सहित मध्य-पूर्व और अफ्रीका के अनेक देशों के कई परियोजनाओं में अपना योगदान दिया है।

केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र के प्रमुख विषय/प्रयोगशालाएं हैं– नदी अभियांत्रिकी, भंडारण एवं संबद्ध ढांचे, तटीय एवं ऑफ शोर अभियांत्रिकी, शिप हाइड्रोडायनामिक्‍स, हाइड्रोलिक मशीनरी, पृथ्‍वी विज्ञान, गणितीय मॉडलिंग, आधारभूत ढांचे और इंस्‍ट्रूमेंटेशन एवं कंट्रोल इंजीनियरिंग। अद्यतन उपकरणों और उच्‍च स्‍तरीय ढांचे सहित सॉफ्टवेयर सुविधा वाली 50 डिवीजनें इन विषयों के संबंध में अनुसंधान कार्य करती हैं। अपनी सभी क्रियाओं में संस्थान अनुशासनात्मक ढंग से देश और अपने कार्यक्षेत्र में आने वाले विषयों पर अद्वितीय सेवाएं उपलब्ध करवाती है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड

केंद्रीय भूजल बोर्ड जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत भूजल के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय शीर्ष संगठन है। इसका उद्देश्‍य आर्थिक एवं पारिस्‍थितिकीय दक्षता और समानता के सिद्धांतों के आधार पर वितरण और अन्‍वेषण, मूल्‍यांकन, संरक्षण, उनमें वृद्धि और प्रदूषण से बचाव सहित भारत के भूजल संसाधनों के प्रबंधन, स्‍थायी एवं वैज्ञानिक विकास के लिए प्रौद्योगिकियां विकसित करना उन्‍हें वितरित करना तथा राष्‍ट्र नीतियों की निगरानी और उन्‍हें लागू करना। केंद्रीय भूजल बोर्ड का गठन 1970 में कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन संस्थान नलकूप खोज संगठन का पुनःनामकरण करके किया गया। सन् 1972 में भारतीय भू-सर्वेक्षण की भू-जल शाखा में इसका विलय कर दिया गया।

यह बोर्ड एक बहुविषयक वैज्ञानिक संगठन है जिसमें जल भूविज्ञानी, भूभौतिकविद, रसायनज्ञ, जल विज्ञानी, जल मौसम विज्ञानी और अभियंता काम करते हैं। इनका कार्य देश में भूजल संसाधनों के वैज्ञानिक अध्‍ययन, अन्‍वेषण जांच, भूजल की निगरानी, मूल्‍यांकन, वृद्धि और नियमन करना है। इस बोर्ड का मुखिया चेयरमैन होता है, जो केंद्रीय भूजल प्राधिकरण का भी प्रमुख होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के चार तकनीकी खंड हैं, प्रत्‍येक का मुखिया एक सदस्‍य होता है –

  • सर्वेक्षण मूल्‍यांकन और निगरानी खंड,
  • अन्‍वेषणकारी खुदाई और सामग्री प्रबंधन खंड,
  • सतत् प्रबंधन और संपर्क खंड, और
  • प्रशिक्षण एवं प्रौद्योगिकी अंतरण खंड।

बोर्ड के प्रशासनिक और आर्थिक मामलों से संबंधित निर्णय क्रमशः निदेशक (प्रशासन) और वित्त और खाता अधिकारी (एफएओ) द्वारा लिए जाते हैं। बोर्ड के 18 क्षेत्रीय कार्यालय हैं, प्रत्‍येक में एक क्षेत्रीय निदेशक और देश में इसके 11 राज्‍य इकाई कार्यालय और 17 अभियांत्रिकी डिवीजनें हैं। राजीव गांधी राष्ट्रीय भूजल प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान बोर्ड द्वारा क्षमता विस्तार के लिए किए जा रहे कार्यों में उसकी मदद करता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत बनाया गया केंद्रीय भूजल प्राधिकरण भूजल विकास नियमन से संबंधित कार्य देखता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड की प्रमुख गतिविधियों में बड़े पैमाने पर भूजल स्तर प्रबंधन अध्ययन, अन्वेषणकारी ड्रिलिंग कार्यक्रम, भूजल स्तर की निगरानी तथा भूजल अवलोकन कुंओं, जिसमें चौड़े मुंह वाले तथा बोरवेल शामिल, की मदद से जल गुणवत्ता का अवलोकन करना शामिल है। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए वर्षा जल संग्रहण और जल स्रोतों के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए प्रदर्शित योजनाओं का अनुपालन करना भी इसका उत्तरदायित्व है। संबद्ध राज्यों की एजेंसियों के साथ मिलकर बोर्ड देश के तेजी से नीचे जा रहे भूजल स्तर की आवधिक जांच करता है। भूभौतिकी का अध्ययन, दूरसंवेदी और जीआईएस अध्ययन और भूजल प्रारूपों के अध्ययन आदि के द्वारा किए जा रहे कार्यों के लिए उपयोगी जानकारी जुटाना

भूजल स्तर से जुड़े कई पहलुओं जैसे भूजल में कमी, समुद्री पानी का प्रवेश, भूजल का प्रदूषित होना, भूमिगत और भूजल का संयुक्त उपयोग, जल संतुलन आदि पर भी बोर्ड विशेष अध्ययन करता रहता है। भूजल क्षेत्र से संबंधित विविध गतिविधियों से जुड़े अपने कर्मचारियों के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों के प्रतिनिधियों के लिए क्षमता विस्तार की गतिविधयों के आयोजन के अलावा जल संरक्षण और भूमिगत जल के उचित प्रबंधन के महत्व से जनता को अवगत कराने के लिए जागरुकता अभियान भी संचालित किए जाते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा किए गए विविध अध्ययनों से प्राप्त आंकड़े हितग्राहियों द्वारा जल संसाधन प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराते हैं। राज्यों तथा अन्य प्रयोगकर्ता संस्थाओं को भूजल स्रोतों के प्रबंधन और आयोजन में सलाह देने के अलावा केंद्रीय भूजल बोर्ड वैज्ञानिक विधि से सतही जल की खोज, विकास और प्रबंधन के लिए हितग्राहियों को तकनीकी मदद उपलब्ध कराता है। हितग्राहियों तक अपने विभिन्न अध्ययनों के परिणामों की जानकारी पहुंचाने के लिए बोर्ड नियमित तौर पर वैज्ञानिक रिपोर्टों का प्रकाशन करता रहता है। इसमें भूजल प्रबंधन के विभिन्न मसलों पर राज्यों और जिलों की भूजल विज्ञान रिपोर्ट, भूजल वार्षिकी और एटलस, भूजल उपयोगकर्ता नक्शे और निर्देशिका/मैनुअल/प्रचार सामग्री का प्रकाशन शामिल है।

केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्लूए)

केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की स्‍थापना पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम 1986 के भाग 3(3) के अंतर्गत देश में भूजल संसाधनों के विकास और प्रबंधन के नियमन और नियंत्रण के लिए किया गया। पर्यावरण और वन मंत्रालय के द्वारा 14.1.1997 को इस संबंध में नोटिस जारी किया गया तथा मंत्रालय के 6.11.2000 को जारी किए गए एक अन्य नोटिस जारी कर इसका पुनर्गठन किया गया।

प्राधिकरण पानी की लंबे समय तक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भूजल विकास नियंत्रण से संबंधित विभिन्न कार्यों से जुड़ा हुआ है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण अत्‍यधिक उपयोग वाले, संकटग्रस्‍त और अर्द्धसंकट ग्रस्त ब्‍लॉकों/ताल्लुकों/मंडलों/जिलों में उद्योगों/परियोजनाओं द्वारा भूजल दोहन के प्रस्‍तावों को स्‍वीकृति के माध्यम से नियंत्रित कर रहा है। भूजल प्रबंधन में जागरुकता फैलाने और क्षमता विकास के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण जन जागरण और जल प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करता है।

प्राधिकरण ने छतों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली प्रणाली लगाने के निर्देश भी दिए हैं। अत्‍यधिक उपयोग वाले ब्‍लॉकों के राज्‍यों के मुख्‍य सचिवों को भूजल के कृत्रिम पुन:भरण/वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने/अपनाने के लिए सभी आवश्‍यक उपाय करने के निर्देश दिए हैं।

प्राधिकरण देश के भूजल स्रोतों के नियमन और नियंत्रण के लिए विविध कार्य करता है। प्राधिकरण ने दिल्ली, फरीदाबाद, गुड़गांव, गाजियाबाद और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के उन इलाकों, जहां भूजल का स्तर सतह से आठ मीटर से अधिक नीचे है, के अधिसूचित समूह आवासीय समितियों, संस्थाओं, होटलों, उद्योगों, फार्म हाउसों को घरों की छत के ऊपर वर्षा जल संग्रह की तकनीक अपनाने के निर्देश जारी किए हैं।

केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के कार्यों और शक्तियों का विकेंद्रीकरण

केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के नियामक कार्यों को निचले स्तर तक पहुंचाने के लिए जिलास्तरों पर मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति घरेलू उपयोग और पीने के लिए भूजल के इस्तेमाल की अनुमति प्रदान करने के लिए की गई है। 10 राज्यों के अधिसूचित 43 में से 36 ब्लॉक/तालुकाओं में भूजल नियमन के लिए मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की जा चुकी है। उन्हें अधिसूचित जिलों में घरेलू और पेय जल के दोहन के लिए प्राप्त होने वाले आवेदनों को प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप निपटाने होते हैं।

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स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 17-02-2011