विज्ञान और प्रौद्योगिकी
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नाभि‍कीय ईंधन चक्र

नाभि‍कीय ईंधन चक्र

नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम के प्रथम चरण में अनेक सहायक प्रक्रियाएं होती हैं जिन्‍हें कुल मिलाकर नाभिकीय ईंधन चक्र कहा जाता है। इनमें शुरू में खनिजों की खोज, खनन, अयस्‍क का प्रसंस्‍करण और ईंधन संविचरण शामिल हैं जबकि चक्र के अंत की प्रक्रियाओं में इस्‍तेमाल हुये यूरेनियम ईंधन का पुन: प्रसंस्करण और परमाणु अपशिष्‍ट का प्रबंधन शामिल है।

भारत ने दाबित गुरुजल रिएक्‍टरों पर आधारित नाभिकीय उर्जा कार्यक्रम का संपूर्ण नाभिकीय ईंधन चक्र सहित पी.एच.डब्‍लू.आर. से संबधित संयत्रों/सुविधाओं के डिजाइन, निर्माण और प्रचालन की व्‍यापक क्षमता हासिल कर ली है। इसमें पी.एच.डब्‍लू.आर. में मंदक और प्रशीतक के रूप इस्‍तेमाल होने वाले गुरुजल का उत्‍पादन शामिल है।

परमाणु उर्जा विभाग के, नाभिकीय इंधन कार्यक्रम में सर्वाधिक योगदान करने वाले संगठन हैं- अनुसंधान पर्यवेक्षण के लिए परमाणु खनिज निदेशालय, हैदराबाद, भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड, जादुगुड़ा (झारखंड), नाभिकीय ईंधन परिसर, हैदराबाद और गुरुजल बोर्ड, मुंबई। बार्क और इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र चक्र के अंतिम भाग का प्रचालन संभालते है।

शुरूआती ईंधन चक्र

शुरूआती ईंधन चक्र के अंतर्गत खनिज के खनन, उसे कारखाने तक लाने व उसका प्रसंस्‍करण करने एवं ईंधन रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रियाएं आती हैं। इसके अतिरिक्‍त गुरुजल का उत्‍पादन भी परमाणु ऊर्जा विभाग के दाबित गुरुजल रिएक्‍टरों का सहयोगी कार्यक्रम है।

सर्वेक्षण और अन्‍वेषण

परमाणु खनिज अन्‍वेषण और अनुसंधान निदेशालय (एएमडी) यूरेनियम, थोरियम, नियोबियम, टेंटेलम, बेरीलियम, जिरकोनियम, लीथियम, यिट्रीयम और दुर्लभ भू-तत्‍वों के संशाधनों के सर्वेक्षण, खोज और आकलन का कार्यकर्ता है। ये सभी पदार्थ देश के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए जरूरी हैं। निदेशालय (एएमडी) परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्‍थापित करने और नाभिकीय अपशिष्‍ट के निपटान के लिए एनपीसीआइएल के सहयोग से स्‍‍थान चयन के लिए भूगर्भीय अध्‍ययन भी करता है।

परमाणु खनिज के लिए सर्वेक्षण और अनुसंधान का कार्य 1949 में शुरू हुआ। पिछले कई वर्षो के दौरान झारखंड में जादूगुड़ा भाटिन, नरवापहाड़, तुरामडीह, (पूर्व और दक्षिण) बन्‍दुहुरान (तुरामडीह पश्चिम), मध्‍य केरूआडूंगरी, बगजाता, कान्‍यालुका, मोहुलडीह और नन्‍दुप, मेघालय में दोमियासियात और वाखिन, आंध्रप्रदेश में लम्‍बापुर-पेद्दागाट्टू, कोप्‍पुनुरू और तुम्‍मालापल्‍ली के अलावा कर्नाटक के गोगी और राजस्‍थान के रोहिल में भी सर्वेक्षण और अनुसंधान कार्य शुरू हुआ। अभी तक एएमडी ने 61,000 टन विद्यमान यूरेनियम संसाधनों का पता लगाया है।

प्रोटेरोजोइक थालों में विद्यमान असंगति से सम्‍बद्ध उच्‍चकोटि के यूरेनियम भंडारों के प्रमुख स्रोत इस समय आंध्रप्रदेश, राजस्‍थान के दिल्‍ली थाले (वलित पट्टी), कर्नाटक मे भीमा और कालादगी- बादामी थाले, छत्‍तीसगढ़ में इंद्रावती और अबूझमाड़ और मध्‍यप्रदेश में ग्‍वालियर थाले में पाए जाते हैं।

जिन मेसोजोइक और टर्शियरी थालों में विशाल टनेज सैंडस्‍टोन प्रकार के यूरेनियम भंडारों की खोज का कार्य चल रहा है वे मेघालय में मेसोजोइक महाडेक थाला तथा मध्‍यप्रदेश में गोंडवाना थाले के अलावा हिमाचल प्रदेश में अपर टर्शियरी शिवालिक थाले हैं। एएमडी ने कोलंबाइट टैंटैलाइट नियोबियम और टैंटेलम खनिज के विशाल भंडारों का भी पता लगाया है।

पूर्वी और पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्रों ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और महाराष्‍ट्र में जमे बालू के ढेंरो में इल्‍मेनाइट, रूटाइल और ल्‍यूकॉक्सिन (टाइटेनियम), सिलिमेनाइट, गार्नेट, जिरकॉन (जिरकोनियम) और मोनाजाइट (थोरियम और हल्‍के दुर्लभ भूतत्‍व) जैसे पदार्थ पाए गए। इसके अलावा त‍मिलनाडु में टेरी सैंड तथा बिहार और पश्चिम बंगाल के नदी घाटी क्षेत्रों में भी ये पदार्थ पाए गए। भारी खनिज सांद्रता के क्षेत्र केरल में तोट्टपल्‍ली-अलप्‍पुजा़,कोल्‍लम और अलप्‍पुजा जिलों, आंध्रप्रदेश में पूर्वी गोदावरी, नरसापुर, पश्चिम गोदावरी, अमलापुरम जिलों तथा तमिलनाडु के वायाकुल्‍लूर-तट्टूर, कन्‍याकुमारी जिलों में भारी खनिजों की सांद्रता के कई क्षेत्रों का पता चला है।

अभी तक ए.एम.डी. ने लगभग 70 करोड़ टन तटीय बालू के भारी खनिज संसाधनों का पता लगाया है। ओडिशा के पुरी जिले के ब्रह्मागिरि मे मिले खनिज भंडार में 12 करोड़ टन भारी खनिज होने का पता चला है। यह देश में भारी खनिज संसाधन का सबसे बड़ा भंडार है।

खनिज और अयस्‍क प्रसंस्‍करण

परमाणु, खनिज निदेशालय के खोज प्रयासों से झारखंड राज्‍य के सिंहंभूम (पूर्व) में भटीन, जादुगुड़ा़, तुरामडीह और नरवापहाड़ में चार यूरेनियम खानों की शुरूआत हुई। सन् 2007 में सिंहभूमि में बंदुहुरंग में भी एक नई खुली खान शुरू की गई है। इन खानों का संचालन सार्वजनिक उपक्रम, भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (यू.सी.आई.एल.) द्वारा किया जा रहा है जो कि देश की परमाणु ऊर्जा की सभी जरूरतों को पूरा करता है।

परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तहत भविष्‍य की जरूरतों को पूरा करने के लिए यू.सी.आई.एल. ने बागजाता (झारखंड), लंबापुर (आंध्रप्रदेश) और डोमिआसेट (मेघालय) में खानों का विकास कार्य शुरू किया है। परमाणु ऊर्जा विभाग भी अन्‍य स्रोतों के इस्‍तेमाल पर भी काम कर रहा है।

निगम यूरेनियम अयस्‍कों के प्रसंस्‍करण के लिए एक यूरेनियम मिल भी चलाता है ताकि सांद्रित यूरेनियम प्राप्‍त हो सके। यैलो केक नामक इस पदार्थ को ईंधन संविचरण के लिए नाभिकीय ईंधन परिसर (एन.एफ.सी.) भेजा जाता है। इसके अलावा यूरेनियम अयस्‍क के प्रसंस्‍करण संयंत्र से मैग्‍नेटाइट भी हासिल की जाती है।

अयस्‍क प्रसंस्‍करण और यूरेनियम धातु उत्‍पादन के क्षेत्र में शोध और विकास कार्य ट्रांबे में किया जाता है। यूरेनियम इनगोट के उत्‍पादन के लिए यूरेनियम धातु निर्माण केन्‍द्र ट्रांबे में काम कर रहा है।

नाभिकीय ईंधन संविचरण

विद्युत रिएक्‍टरों तथा शोध रिएक्‍टरों के लिए जरूरी ईंधन संविचरण का काम नाभि‍कीय ईंधन परिसर (एन एफ सी), हैदराबाद और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र बार्क (बार्क), मुंबई द्वारा किया जाता है। बार्क और आईबीसीएआर नए ईंधनों के विकास में जुट हैं।

भारतीय पीएचडब्‍ल्‍यूआर में बुनियाद ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम का इस्‍तेमाल होता है। ट्रांबे में पहले ईंधन तत्‍व के 1959 में निर्माण द्वारा बड़ी सफलता प्राप्‍त हुई थी। विद्युत रियेक्‍टरों के लिए औद्यौगिक स्‍तर पर नाभिकीय ईंधन और जिरकोनियम मिश्र धातु के निर्माण के लिए हैदराबाद में 1971 में नाभिकीय ईधन परिसर (एन.एफ.सी) की स्‍थापना की गई। एनएफसी अब एक आइएसओ 9001 संगठन है। इसमें जिरकलॉय-4 युक्‍त प्राकृतिक और नि:शेष यूरेनियम ऑक्‍साइड और थोरिया समूह का निर्माण होता है जिनका इस्‍तेमाल दाबित गुरुजल रियेक्‍टरों में होता है, जिरकलॉय-2 युक्‍त समृद्ध यूरेनियम ऑक्‍साइड का उपसंयोजन तरल धातु प्रशीतित, ब्रीडर रियेक्‍टर के लिए होता है। एनएफसी, पीएचडब्‍ल्‍यूआर और बीडब्‍ल्‍यूआर के लिए जिरकोनियम मिश्र धातु के बुनियादी पुर्जो का भी निर्माण करता है। इसके अलावा एनएफसी स्‍टेनलेस स्‍टील के खांचारहित हेक्‍सकैंस और रियेक्‍टर कोर युग्‍मकों के लिए जरूरी स्‍ट्रक्‍चरलस तथा विशेष मिश्र धातु ट्यूबों का भी उत्‍पादन करता है। यह परमाणु ऊर्जा के पुन: प्रसंस्‍करण संयत्रों और नाभिकीय उर्जा संयंत्रों में इस्‍तेमाल के लिए स्‍टेनलेस स्‍टील के पाइप और ट्यूबों के निर्माण संबधी मांग को भी पूरा करती है।

यह नाभिकीय उर्जा संयंत्रों और परमाणु उर्जा के पुनर्प्रसंस्‍करण संयंत्रों में इस्‍तेमाल होने वाली उच्‍च गुणवत्ता वाली स्‍टेनलेस स्‍टील की ट्यूब और पाइप की मांग भी पूरी करता है।

पिछले छह वर्षो से एनएफसी के संयंत्र अपने वार्षिक उत्‍पादन लक्ष्‍यों को भलीभांति पूरा कर रहे हैं तथा इसके कुछ संयंत्रों ने तो अपनी संयंत्र क्षमता को भी पार कर लिया है। बार्क में औद्योगिक स्‍तर पर अनेक प्रकार के ईंधनों का विकास और संविचरण किया गया है।

टीएपीएस के बॉयलिंग वाटर रियेक्‍टरों के लिए स्‍वदेशी मिश्रित ऑक्‍साइड ईंधन के संविचरण के लिए तारापुर के बार्क में उन्‍नत ईंधन संविचरण सुविधा तैयार की गई। यहां तैयार ईंधन के संतोषजनक परिणाम मिले हैं। जिरकोनियम ऑक्‍साइड चूर्ण की उत्‍पादन समता बढ़ाने के लिए जिरकोनियम ऑक्‍साइड संयंत्र का निर्माण कार्य प्र‍गति पर है।

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स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 09-02-2011