- कृषि (472 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- वाणिज्य (277 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- वित्त (339 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- संचार (131 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- रक्षा (86 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- शिक्षा (405 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- ग्रामीण विकास (94 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- जल संसाधन (122 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- सड़क परिवहन
- उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली
- वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी विकास (355 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण (406 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

- पर्यावरण (156 KB) (पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है)

अनिवार्य वस्तु अधिनियम, १९५५
अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955 (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) का अधिनियम उपभोक्ताओं को अनिवार्य वस्तुओं की सहजता से उपलब्धता सुनिश्चित करने और कपटी व्यापारियों द्वारा शोषण किए जाने से उनकी रक्षा करने के लिए किया गया। अधिनियम में उन वस्तुओं के उत्पादन वितरण और मूल्य निर्धारण को विनियमित एवं नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई है जिन्हें आपूर्ति बनाए रखने या बढ़ाने या उनका समान वितरण प्राप्त करने और उचित मूल्य पर उनकी उपलब्धता के लिए अनिवार्य घोषित किया गया है। अधिनियम के तहत अधिकांश शक्तियां राज्य सरकारों को दी गई हैं।
अनिवार्य घोषित की गई वस्तुओं की सूची की आर्थिक परिस्थितियों में, परिवर्तनों विशेषतया उनके उत्पादन मांग और आपूर्ति के संबंध में, के आलोक में समय-समय पर समीक्षा की जाती है। 15 फरवरी, 2002 से सरकार ने पहले घोषित अनिवार्य वस्तुओं की सूची से 12 वस्तुओं को पूरी तरह और एक को आंशिक रूप से हटा दिया है। आर्थिक विकास त्वरित करने और उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने के लिए 31 मार्च 2004 से और दो वस्तुओं को सूची से हटा दिया गया है। वर्तमान में अनिवार्य वस्तुओं की सूची में 16 मदें हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के संदर्भ में यह निर्णय लिया गया कि अनिवार्य वस्तु अधिनियम 1944 केंद्र और राज्य के लिए अम्ब्रेला विधान के रूप में जारी रहे जब आवश्यक हो इसका उपयोग तथापि प्रगतिशील नियंत्रण और प्रतिषेध के लिए किया जाए। तदनुसार केंद्र सरकार ने लाइसेंसिंग की आवश्यकता हटाने, स्टॉक सीमा और विनिर्दिष्ट खाद्य वस्तुओं की आवा-जाही प्रतिबद्ध करने के आदेश 2002, 15 फरवरी, 2002 अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955 (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) के तहत जारी कर दिया है जिसमें गेहूँ, धान, चावल, मोटे अनाज, शर्करा, खाद्य तिलहन और खाद्य तेलों के संबंध में जिसके लिए किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है या अनुमति की आवश्यकता अधिनियम के तहत जारी किसी आदेश के अधीन नहीं है, किसी भी मात्रा में व्यापारी को मुक्त खरीददारी करने, भण्डारण बिक्री, परिवहन, वितरण, बिक्री करने की अनुमति दी गई हैं।
खाद्य सामग्री के कुछ और मदों के संबंध में इसी प्रकार प्रतिषेध अर्थात दाल, गुड़, गेहूँ के उत्पाद (अर्थात मैदा, रवा, सूजी, आटा परिष्कृत आटा और ब्रान) और हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेल या वनस्पति को भी दिनांक 16 जून, 2003 की अधिसूचना आदेश द्वारा हटा दिया गया है। इसके अतिरिक्त इस अधिसूचना के द्वारा 15 फरवरी 2002 का उत्क केंद्रीय आदेश में उत्पादक, विनिर्माता, आयातक और निर्यातक को शामिल करने के लिए व्यापारी (डीलर) की परिभाषा का दायरा बढ़ाने के लिए संशोधन किया गया है। तथापि, आदेश को उस हद तक संशोघित किया गया है कि किसानों को मूल्य समर्थन सुनिश्चित करने के लिए चावल के लेवी आदेश को बरकरार रखा गया है, जबकि सार्वजनिक वितरण प्रणाल/कल्याण योजनाओं के लिए भारतीय खाद्य निगम/राज्य सरकार की एजेंसियों के अधिकार में चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। इसी प्रकार चीनी के उत्पादक, विनिर्माता आयातक और निर्यातकों को उपयुक्त आदेश की परिधि से बाहर रखा गया है ताकि चीनी के भण्डार, भण्डारण आदि के संबंध में निदेशन जारी किया जाना सुकर बनाया जा सके, विशेषतया प्रचलित निर्गम प्रक्रम/लेवी चीनी कोटा के संदर्भ में और ईख उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान करने के लिए भी।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: १४-०३-२००८
