वाणिज्य एवं उद्योग
यह पृष्‍ठ अंग्रेजी में (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट)

वस्त्र

भारतीय वस्त्र उद्योग का देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान है। जीवन की एक मूलभूत आवश्यकता होने के साथ ही इसका देश के औद्योगिक उत्पादन, रोजगार के सृजन और निर्यात के द्वारा विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी इसका केंद्रीय योगदान है। देश के औद्योगिक उत्पादन में 14 प्रतिशत, सकल घरेलू उत्पाद में 4 प्रतिशत तथा निर्यात आय में 13.50 प्रतिशत वस्त्र उद्योग का योगदान है। यह उद्योग देश के यह 35 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। महिलाओं और अजा/अजजा के लोगों की एक बड़ी संख्या इस क्षेत्र से अपनी आजीविका अर्जित कर रही है। कपड़ा क्षेत्र कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। इस प्रकार, इस उद्योग का सर्वांगीण विकास देश की अर्थव्यवस्था के सुधार को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा नीतिगत उपाय शुरू किए जाने के वजह से, वस्त्र उद्योग पिछले छः दशक के मुकाबले आज कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में है। मूल्य के हिसाब से यह उद्योग जहां छः दशक पहले 3 से 4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था वहीं आज 8 से 9 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रहा है।

प्रगतिशील घरेलू अर्थव्यवस्था, कपास उत्पादन में वृद्धि, अनुकूल वस्त्र नीति तथा 31 दिसंबर, 2004 को समाप्त की गई बहुरेशा व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र के विकास में काफी तेजी आई। पिछले कुछ सालों से लागू उचित कराधान नीति के कारण सभी विभागों में अवसरों की एकसमान उपलब्धता ने भी इस क्षेत्र के उद्योगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र के उद्योगों के लिए एक मजबूत नींव रखी जा चुकी है, जिस पर विश्वस्तरीय उत्पादन इकाइयां अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग कर अंतर्राष्ट्रीय पटल पर में एक स्थान बना सकते हैं।

पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा नीतिगत उपाय शुरू किए जाने के वजह से, वस्त्र उद्योग पिछले छः दशक के मुकाबले आज कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में है। मूल्य के हिसाब से यह उद्योग जहां छः दशक पहले 3 से 4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था वहीं आज 8 से 9 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रहा है।

वस्त्र उत्पादन और निवेश में लगातार बढ़ोतरी से इस उद्योग का विकास प्रदर्शित होता है। 2004-05 में 45.38 बिलियन वर्ग मीटर के मुकाबले 2008-09 में वस्त्र उत्पादन 55 बिलियन वर्ग मीटर था। वस्त्र उद्योग ने पिछले पांच वर्षों के दौरान निवेश में काफी उछाल देखा है, जो 2004-05 के 7,349 करोड़ रुपए से बढ़ कर वर्ष 2005-06 में 15,032 करोड़ रुपए, वर्ष 2006-07 में 66, 233 करोड़ रुपए, 2007-08 में 19,917 करोड़ रुपए और 2008-09 में 42,807 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। अनुमान है की यह निवेश 2012 तक 1,50,600 करोड़ रुपए के आंकड़े को छू लेगा। निवेश में ये बढ़त वर्ष 2012 तक 17.37 मिलियन नौकरियों (12.02 मिलियन प्रत्यक्ष और 5.35 मिलियन अप्रत्यक्ष) का सृजन करेंगी।

निर्यात

कपड़ा उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला है, देश के व्यापारिक निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 13.5 प्रतिशत की है। मल्टी फाइबर व्यवस्था (एमएफए) के समाप्त होने के बाद नई तकनीकों और क्षमता विकास के द्वारा उद्योग ने विकास की नए सोपान तय किए हैं। एमएफए के बंद होने के एक साल के भीतर भारतीय निर्यात में 22 प्रतिशत की दर से विकास हुआ है। वर्ष 2004-05, 2005-06 और 2006-07 में भारतीय वस्त्र और कपड़े का निर्यात क्रमशः 14, 17.52 और 18.73 बिलियन अमेरिकी डालर का रहा। भारतीय वस्त्र उद्योग कई उतार-चढ़ाव देख चुका है। एक ओर जहां 2007-08 में भारतीय रुपए की कीमतों में बढ़त हुई वहीं दूसरी तरफ 2008-09 में वैश्विक मंदी की मार भी इसे झेलनी पड़ी। वर्ष 2007-08 में भारत का वस्त्र निर्यात 25.06 बिलियन अमेरिकी डालर के मुकाबले 22.13 बिलियन डालर रहा। वर्ष 2008-09 में यह 18.51 बिलियन डालर रहा (वित्तीय वर्ष अप्रैल-फरवरी 2008-09) जबकि इसी अवधि के दौरान पिछले साल 19.55 बिलियन अमेरिकी डालर का निर्यात हुआ।

परिधान और वस्त्र

परिधान उद्योग एक निर्यात प्रधान उप-क्षेत्र है जो कुल भारतीय वस्त्र निर्यात में 40-45% का योगदान देता है। यह एक कम निवेश आवश्यकता और श्रम प्रधान उद्योग है: उप क्षेत्र में 1.00 लाख रुपए का निवेश 6-8 नौकरियां सृजित करता है।

लघु उद्योग के लिए रखे गये परिधान उत्पाद आरक्षित कर दिए जाने के कारण कपड़ा उद्योग की वृद्धि अवरुद्ध हो गई थी । परिणामस्वरूप, परिधान इकाईयां ना तो अर्थव्यवस्था की अधिकतम पैमाने को प्राप्त कर पाईं और न ही अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता वाले वस्त्रों का उत्पादन कर सकीं।

बदली हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने 2002-03 में बुने हुए परिधान को और नीट-वियर क्षेत्र को 2005-06 में आरक्षण से मुक्त कर दिया। इस उद्योग को दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान उत्कृष्टता प्राप्त हुई। शुरुआत में इसकी 15 -16 प्रतिशत की दर से बढ़त हुई और 2005 -2006 के दौरान, इसकी विकास दर 20 -22 प्रतिशत तक पहुंच गयी। इस त्वरित विकास दर के लिए उत्प्रेरक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोटा के शासन का अंत, संगठित खुदरा बिक्री में वृद्धि, घरेलू बाजार में उपभोक्तावाद का विकास, और एक अनुकूल शासन नीति आदि हैं।

दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान, बने बनाए वस्त्रों का निर्यात 13 .72 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ा । इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव तब देखा गया जब 2005-06 में यह 28 प्रतिशत तक बढ़ गया। 2012 तक इस उप क्षेत्र में 21.800.00 करोड़ रुपये की निवेश की आवश्यकता होगी, जो 56.40 लाख लोगों के लिये रोजगार पैदा करेगा, जिसमें से 28.25 लाख लोग अर्ध प्रशिक्षित और 11.30 लाख लोग अप्रशिक्षित होंगे। वस्त्र और परिधान के उप क्षेत्र में रोजगार और निर्यात की क्षमताओं को देखते हुए, सरकार इसके विकास और विस्तार को प्राथमिकता देगी। कठोर श्रम कानूनों में सुधार के प्रयास किये जायेंगे और सार्वजनिक निजी भागीदारी के जरिये ब्रांड को बढ़ावा दिया जाएगा। कामन डेटा प्रदान करने के लिए और इस उद्योग के लिये बिक्री के प्रतिष्ठानों की स्थापना की जायेगी।

पृष्ठ: 1 | 2 | अगला

स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 11-01-2011