औषधि की वैकल्पिक प्रणाली
आयुर्वेद (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
शब्द 'आयुर्वेद' का अर्थ है जीवन का विज्ञान। संभवतया यह सबसे पुराना चिकित्सा विज्ञान रहा है जिसकी सकारात्मक परिकल्पना शारीरिक, मानसिक सामाजिक, नैतिक और अध्यात्मिक कल्याण को मिलाने के द्वारा प्राप्त करने वाला स्वास्थ्य रही है। भारत वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल के तत्कालीन परिदृश्य में आयुर्वेद की वैश्विक उपयोगिता की वकालता करने में आगे आया है। इसके परिणामस्वरूप बहुत से विदेशी देशों में इस विज्ञान की प्रभावोत्पादकता और महत्व को समझना शुरू किया है। यूएसए, यूके, रूस, जर्मनी हंगरी, दक्षिण अफ्रीका और विश्व के अन्य भाग से लोग यहां आयुर्वेद विशेषज्ञों द्वारा उपचार कराने के लिए भारत आते हैं।
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योग (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
योग एक विज्ञान तथा शारीरिक, मानसिक, नैतिक और अध्यात्मिक रूप से स्वास्थ्य रहने की कला भी है। इसका क्रमिक विकास पशु स्तर से सामान्य तक, वहां से दैवीय, अंतत: तक। यह किसी भी प्रकार से जाति, आयु, लिंग, धर्म, जाति या आस्था द्वारा सीमित नहीं है और इसका अभ्यास उनके द्वारा किया जा सकता है जो बेहतर जीवन के लिए शिक्षा पाना चाहते हैं और जो अपना जीवन अधिक सार्थक बनाना चाहते हैं। भारत में असंख्य योग केन्द्र है जो सूचना देते हैं और यह शिक्षा देते है कि कैसे योग और औषध किसी के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यद्यपि योग शिविर लगभग सभी भारतीय शहरों में आयोजित किए जाते हैं जो योग और ध्यान उपचार के लिए लोकप्रिय हैं, जो निम्नलिखित हैं:
- ऋषिकेश
- हरिद्वार
- धरमशाला
- पांडिचेरी में औरोविल
- बंगलौर के निकट पुट्टापर्ती
- माउंट आबू
भारत में योग का विकास विज्ञान के रूप में किया गया है जो अनेक रोगों को ठीक करने के लिए लाभदायक है।
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नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
नेचुरोपैथी ठीक-ठाक रखने के विज्ञान की प्रणाली है जो शरीर में निहित शक्ति को प्रकृति के पांच महान तत्वों की सहायता से पुन:स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए उत्तेजित करती है अर्थात मृदा, जल, वायु, अग्नि और ईथर। नेचुरोपैथी प्रकृति में वापस आने का आह्वान है और स्वयं, समाज और पर्यावरण के साथ सामन्जस्य करके जीने का सरल तरीका अपनाना है।
नेचुरोपैथी रोग प्रबंधन का न केवल सरल व्यावहारिक तरीका प्रदान करता है अपितु एक सुदृढ़ सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है जो सभी संपूर्णत्व चिकित्सा देखभाल के लिए प्रयोज्य है और स्वास्थ्य की नींव पर ध्यान देकर; और भावी पीढ़ी के लिए अधिक किफायती औषधीय ढांचा भी प्रदान करता है।
नेचुरोपैथी पश्चिमी दुनिया में भी जीवन में खुशहाली वापस लाने के प्राकृतिक तरीके के कारण लोकप्रिय हो रहा है।
यूनानी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
औषध की यूनानी प्रणाली एक प्राचीनतम प्रणाली है। यह अभी भी लोकप्रिय है और भारतीय उपमहाद्वीप एवं विश्व के अन्य भागों में इसका अभ्यास किया जाता है। यूनानी के मूल सिद्धांतों के अनुसार शरीर चार मूल तत्वों से बना है अर्थात पृथ्वी, वायु, जल और अग्नि जिनकी अलग-अलग विशेषता है ठंड, गर्म, गीला, शुष्क।
रोगों का पता नाड़ी (नब्ज) की सहायता से मूत्र एवं मल की जांच करके लगाया जाता है। और रोगियों की जांच को सरल बनाने के लिए स्थल पर निदान किया जाता है इसमें सरल एवं आधुनिक उपकरणों की सहायता ली जाती है।
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सिद्धा (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
सिद्धा प्रणाली के सिद्धांत और शिक्षा मौलिक और व्यावहारिक दोनों हैं। यह आयुर्वेद के समान ही है इसकी विशेषता आंतरिक रसायन है। इस प्रणाली के अनुसार मानव शरीर ब्रहमाण्ड की प्रतिकृति है और इसी प्रकार से भोजन और औषधि भी चाहे उनका उद्भव कहीं से भी हुआ हो।
यह प्रणाली जीवन में उद्धार की परिकल्पना से जुड़ी हुई है। इस प्रणाली के प्रवर्तकों का मानना है कि इस अवस्था को प्राप्त करना संभव है औषधि और मनन: चिंतन के द्वारा। सिद्धा प्रणाली आकस्मिक मामलों को छोड कर सभी प्रकार के रोगों का इलाज करने में सक्षम है। सामान्य तौर पर यह प्रणाली त्वचा संबंधी सभी समस्याओं का उपचार करने में सक्षम हैं विशेष कर सोरियासिस, यौन संचारित संक्रमण, मूत्र के रास्ते में संक्रमण, यकृत की बीमारी और गैस्ट्रो आंत के रास्ते के रोग, सामान्य डेबिलिटी, पोस्टपार्टम एनेमिया, डायरिया और आथ्रॉइटिस और एलर्जी विकार के अतिरिक्त सामान्य बुखार।
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होम्योपैथी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
आज होम्योपैथी तेजी से बढ़ती प्रणाली बन गई है और लगभग पूरी दुनिया में इसका अभ्यास किया जा रहा है। एक सामान्य अध्ययन संकेत देता है कि लगभग 10 प्रतिशत भारतीय जनसंख्या अपने स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता के लिए केवल होम्योपैथी पर निर्भर है। अब लगभग डेढ़ शताब्दी से भी अधिक हो रहा है जब से भारत में होम्योपैथी का प्रचालन हो रहा है। यह देश की जड़ और परंपराओं में इतनी अच्छी तरह से घुल-मिल गया है कि इसे औषधि की एक राष्ट्रीय प्रणाली के रूप में मान्यता मिल गई है और बड़ी संख्या में लोगों को स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी ताकत इसके स्पष्ट प्रभाव में निहित है चूंकि यह मानसिक भावनात्मक, अध्यात्मिक और शारीरिक स्तरों पर आंतरिक संतुलन के संवर्धन द्वारा रोगी व्यक्ति के लिए संपूर्णता का तरीका अपनाती है। और इसलिए पूरे विश्व के लोग होम्योपैथी द्वारा रोगों को चंगा करने में भारत की मास्टरी का लोहा मानते हैं।
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स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल

