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दृश्य कला
चित्रकारी
भारत की चित्रकारी की विरासत तो आदिम युग से चली आ रही है जब आदमी गुफाओं चट्टानों से बने घरों में रहते थे। प्रारम्भ में चित्रकारी की शुरूआत इसलिए हुई कि लोग लेखा-चित्रों या आकृतियों के जरिए एक-दूसरे को अपनी बात कह सकें। धीरे-धीरे इसमें कला का रूप ले लिया जिसका प्रमाण होशंगाबाद मिर्ज़ापुर और बिम्बेक्ता की गुफाओं से मिलता है।
भित्ति-चित्र (मुराल)
परम्परागत भित्ति-चित्र कला आधुनिक महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं में देखी जा सकती है। इस विशेष चित्रकारी का प्रेरणा स्रोत संवेदनाशील बुद्ध हैं। बौद्ध पुराण से संबंधित जातक कथाएं ही इन चित्रों का विषय हैं। अज्ञात कलाकारों ने मिलकर बड़ी शालीनता और हल्के सुंदर रंगों से इनका चित्रण किया।
सिन्धु घाटी में पाए गए चित्रों से उस समय मुराल चित्रकारी के व्यापक प्रचलन का संकेत मिलता हैं जिसकी प्रमाण मिट्टी के बर्तनों पर की गई चित्रकारी से मिलता है।
लिपि
ग्यारहवीं सदी के आने तक भित्ति-चित्रों का आकार कम होते होते एक ताड़पत्र की पट्टी जितना रह गया। यहीं से शुरू हुई हस्तलिपि चित्रकारी। बौद्ध गाथाएं सुनाने के लिए बंगाल और बिहार में हस्तलिपि का आरम्भ हुआ। हस्तलिपि चित्रकारी में प्रतीकों के प्रयोग से इसके प्रसंगों में विविधता आई। प्रतीक प्रयोग भारतीय लघु चित्रकारों की दृश्य अभिव्यक्तियों का और प्रकृति से संबंध का भाव था। प्रतीक प्रयोग रेखाओं के चित्रण और रंग सज्जा के अपने मूल कार्य से परे उनके भावों की अभिव्यक्ति भी हुई।
भारत में मुगलों के आगमन से भारतीय चित्रकारी की एक सुदृढ़ चित्रात्मक शैली को नया रूप दिया, जो परम्परागत फारसी लघु चित्र कला से भी प्रभावित थी। मुगलों की रुचि साम्राज्य स्थापित करने और इस तरह से भवन निर्माण में ज्यादा थी। केवल महान मुगल बादशाह अकबर ने कला को प्रोत्साहन दिया और फारसी तथा इस्लाम की कला शैलियों को मिलाकर लघु चित्रकारी का पुनरूत्थान किया। अकबर के दरबार में जो कलाकार थे वे सामान्यत: प्रतिकृतियों, दरबारी जीवन, युद्ध के दृश्यों और प्रकृति का चित्रण करते थे। लेकिन इस कला ने उस समय जोर पकड़ा जब सम्राट अकबर ने रामायण और महाभारत जैसी भारतीय पुस्तकों के अनुवाद करने और सचित्र प्रदर्शन की इजाजत दी। अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी कला को प्रोत्साहन दिया और उसके राज्यकाल में भी कला ने बहुत उन्नति की। इस समय तक कलाकारों ने चित्रकारी के लिए अन्य उत्पादों का प्रयोग शुरू कर दिया था जैसे कि मालचित्र, लेपिस सजुली, सोना, चांदी और 'पिऔरी' जो कि आम के पत्तों पर गोमूत्र से प्राप्त किया गया पीला रंग है।
मुगल दरबार के कलाकारों ने बाद में राजपूत राजाओं के शिल्पकारों को सभी अपने साथ मिला लिया। रेखाओं मे चित्रित और रंगों से सजाई गई राजपूत चित्रकारी में उस देश की पौराणिक कथाओं और दन्त कथाओं, राम, कृष्ण की कहानी भागवत और गीत गोबिन्द को दर्शाया गया है। राजपूतों के शासनकाल में चित्रकारी की जिन शैलियों का अधिपत्य रहा वे खास शैलियां है कोटा और किशनगढ़ चित्रकारी (राधा-कृष्ण की कहानी)। प्रतापी राजपूत योद्धाओं द्वारा स्थापित पहाड़ी राज्यों में जिन चित्रकलाओं ने उन्नति की उनमें बशोली अपने भावों की गहराई के कारण कुल्लु लोक शैली से निकटता और कागज़ अपनी रोमांचकता और व्यापक प्रस्तुतियों के कारण बेजोड़ है। तथापि, संगीत के पौराणिक स्रोतों को दक्षिण की तंजौर चित्रकारी में दर्शाया गया है।
समकालीन कला
भारत मे बिट्रिश राज्य को प्रभुत्व बढ़ने से सृजनात्मक भारतीय कला की बहुत क्षति हुई। अंग्रेज शासकों ने भारतीय कलाकारों को वाटर और ऑयल कलर से प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण करने में उलझा दिया जिससे मूल कला का विलोप हो गया। शीघ्र ही देश में एक राजनीतिक लहर उठी जिसने प्रसिद्ध बंगाल स्कूल का पुनरूत्थान हुआ। अबीन्द्रनाथ टैगोर, गगनेन्द्रनाथ टैगोर और नन्द लाल बोस जैसे महान कलाकार इस स्कूल के अग्रेसर (पायनिर) थे। भारतीय कला को पुन: आकार प्रदान करने और अन्यों को इसके लिए प्रेरित करने में इनका बड़ा योगदान रहा है। अबीन्द्रनाथ को प्रतिकृति, गगनेन्द्रनाथ को उस काल की सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं का कार्टून रूप में चित्रण की विशिष्टता और नन्दकाल को वीरता के प्रसंगों के चित्रों की चित्रकारी में सुविज्ञता प्राप्त थी जिन्होंने बाद में एशियाई कला के अन्वेषण के लिए कला में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण की। तथापि, राष्ट्रवाद इस बात का प्रमाण है कि कुछ कलाकार लोक साहित्य से जुड़े थे। रबीन्द्रनाथ टैगोर (नोबल पुरस्कार विजेता) प्रकृतिवाद, अमूर्तिकरण और अभिव्यक्तिवाद के स्वतंत्र रूपान्तरण के लिए चार्टर प्रदान किया। आज भरत को जेमिनी रॉय (जिन्होंने लोक परम्परा के सामर्थ्य की खोज करके उसका कई रूपों में चित्रण किया) अमृता शेरगिल (जिन्होंने पश्चिम की चित्रात्मकता और भारतीय सोच को एक साथ जोड़ा), बिनोद मुखर्जी और रामघिंकर जैसे विश्व विख्यात चित्रकारों का देश होने का गौरव हासिल हैं नई पीढ़ी के चित्रकारों में जिन्होंने खाली स्थानों की सुन्दरता से भरपाई की है, एम.एफ हुसैन, कृष्णन खन्ना और सतीश गुजरात प्रसिद्ध हैं।
मूर्तिकला
भारत के वास्तुशिल्प, मूर्तिकला, कला और शिल्प की जड़े भारतीय सभ्यता के इतिहास में बहुत दूर गहरी प्रतीत होती हैं। भारतीय मूर्तिकला आरम्भ से ही यथार्थ रूप लिए हुए है जिसमें मानव आकृतियों में प्राय: पतली कमर, लचीले अंगों और एक तरूण और संवेदनापूर्ण रूप को चित्रित किया जाता है। भारतीय मूर्तियों में पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं से लेकर असंख्य देवी देवताओं को चित्रित किया गया है।
भारत की सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ों के बड़े-बड़े जल कुण्ड प्राचीन मूर्तिकला का एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं। दक्षिण के मंदिरों जैसे कि कांचीपुरम, मदुरै, श्रीरंगम और रामेश्वरम तथा उत्तर में वाराणसी के मंदिरों की नक्काशी की उस उत्कृष्ट कला के चिर-प्रचलित उदाहरण है जो भारत में समृद्ध हुई।
केवल यही नहीं, मध्य प्रदेश के खजुराहों मंदिर और उड़ीसा के सूर्य मंदिर में इस उत्कृष्ट कला का जीता जागता रूप है। सांची स्तूप की मूर्तिकला भी बहुत भव्य है जो तीसरी सदी ई.पू. से ही इसके आस-पास बनाए गए जंगलों (बालुस्ट्रेड्स) और तोरण द्वारों को अलंकृत कर रही हैं। मामल्लापुरम का मंदिर; सारनाथ संग्रहालय के लायन केपीटल (जहां से भारत की सरकारी मुहर का नमना तैयार किया गया था) में मोर्य की पत्थर की मूर्ति, महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं को चित्रित करने वाली अमरावती और नागर्जुनघोंडा की वास्तुशिल्पीय मूर्तियां इसके अन्य उदाहरण हैं।
हिन्दु गुफा वास्तुशिल्प की पराकाष्ठा मुम्बई के निकट एलीफेंटा गुफाओं मे देखी जा सकती है और इसी प्रकार एलोरा के हिन्दु और जैन शैल मंदिर विशेष रूप से आठवीं शताब्दी का कैलाश मंदिर वास्तुशिल्प का यह रूप देखा जा सकता है।
इतिहास के कला खंडों के समृद्ध साक्ष्य संकेत करते हैं कि भारतीय शिल्प कला को एक समय पूरे विश्व में उच्चतम स्थान प्राप्त था।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल ![]()
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