पंजाब
| ब्यौरे | विवरण |
|---|---|
| 50,362 वर्ग कि.मी. | |
| 24,358,999 | |
| चंडीगढ़ | |
| पंजाबी |
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इतिहास और भूगोल
प्राचीन पंजाब किसी जमाने में विस्तृत भारत-ईरानी क्षेत्र का हिस्सा रहा है। बाद के वर्षों में यहां मौर्य, बैक्ट्रियन, यूनानी, शक, कुषाण, गुप्त जैसी अनेक शाक्तियों का उत्थान और पतन हुआ। मध्यकाल में पंजाब मुसलमानों के अधीन रहा। सबसे पहले गजनवी, गौरी, गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक, लोदी और मुगल वंशों का पंजाब पर अधिकार रहा। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में पंजाब के इतिहास ने नया मोड़ लिया। गुरू नानक देव जी की शिक्षाओं से यहां भक्ति आंदोलन ने जो पकडा। सिख पंथ ने एक धार्मिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म और समाज में फैली कुरीतियो को दूर करना था। दसवें गुरू गोबिंद सिंह जी ने सिखों का खालसा पंथ के रूप में संगाठित किया तथा उन्हें सदियों के दमन और अत्याचार के खिलाफ एकजुट किया। उन्होंने देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और मानवीय मूल्यों पर आधारित पंजाबी राज की स्थापना की । एक फारसी लेखक के शब्दों में महाराज रणजीत सिंह ने पंजाब को ‘मदम कदा’ अर्थात् ‘बाग-ए-बहिश्त’ यानी स्वर्ग में बदल दिया। किंतु उनके देहांत के बाद अंदरूनी साजिशों और अंग्रेजों की चालों के कारण पूरा साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। अंग्रेजो और सिखों के बीच दो निष्फल युद्धों के बाद 1849 में पंजाब ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी के आगमन से बहुत पहले ही पंजाब में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष आरंभ हो चुका था। अंग्रेजों के खिलाफ यह संघर्ष सुधारवादी आंदोलनों के रूप में प्रकट हो रहा था। सबसे पहले आत्मानुशासन और स्वशासन में विश्वास करने वाले नामधारी संप्रदाय ने संघर्ष का बिगुल बजाया। बाद में लाला लाजपतराय ने स्वतंत्रता-संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। चाहे देश मे हो या विदेश में, पंजाब स्वतंत्रता संग्राम में हर मोर्चे पर आगे रहा। देश की आजादी के बाद भी पंजाब के कष्टों का अंत नहीं हुआ और उसे विभाजन की विभीषिका का सामना करना पड़ा जिसमें बड़े पैमाने पर रक्तपात तथा विस्थापन हुआ। विस्थापित लोगों के पुनर्वास के साथ-साथ राज्य को नए सिरे से संगठित करने की भी चुनौती थी।
पूर्वी पंजाब की आठ रियासतों को मिलाकर नए राज्य ‘पेप्सू’ तथा पूर्वी पंजाब राज्य संघ-पटियाला का निर्माण किया गया। पटियाला को इसकी राजधानी बनाया गया। सन 1956 में पेप्सू को पंजाब में मिला दिया गया। बाद में 1966 में पंजाब से कुछ हिस्से निकालकर हरियाणा बनाया गया।
पंजाब देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर में जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में हरियाणा तथा राजस्थान हैं।
कृषि
पंजाब राज्य में देश के भौगोलिक क्षेत्र के केवल 1.5 प्रतिशत हिस्से में देश के कुल गेहूं का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत और 12 प्रतिशत कपास की पैदावार करता है। अब पंजाब में फसल गहनता 186 प्रतिशत से अधिक है। पंजाब ने पिछले दो दशकों में 40 से 50 प्रतिशत चावल तथा 50 से 70 प्रतिशत गेहूं उत्पादित कर ‘देश की खाद्य टोकरी तथा भारत का अनाज भंडार’ का खिताब हासिल किया है। विश्व के कुल उत्पादन में पंजाब में एक प्रतिशत चावल, दो प्रतिशत गेहूं और 2 प्रतिशत कपास का योगदान करता है। पंजाब में प्रति हेक्टेयर खाद का उपयोग 177 किग्रा. है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 90 किग्रा. प्रति हेक्टेयर खाद प्रयुक्त की जाती है। राज्य ने वर्ष 1991-92 से 1988-99 तक और 2001 से 2003-04 लगातार दस वर्षो तक कृषि विस्तार सेवाओं के लिए राष्ट्रीय उत्पादकता पुरस्कार प्राप्त किया।
उद्योग
पंजाब में लघु उद्योग इकाइयों की संख्या 2.04 लाख है। 9.35 लाख लोगों को रोजगार देने वाली ये इकाइयां साइकिलो के कल-पुर्जे, सिलाई मशीन, हाथ के औजार, मशीनों के हिस्से-पुर्जे मोटरवाहनों के कल-पुर्जे, बिजली की वस्तुएं, खेल कूद का सामान, शल्य चिकित्सा में काम आने वाले उपकरण, चमड़े का सामन, हौजरी, बुने हुए वस्त्र, नट-बोल्ट, कपडा, चीनी, वनस्पति तेल आदि का उत्पादन करती हैं। राज्य में 600 बडी/मंझोली औद्योगिक इकाइयां हैं। चंडीगढ़ के पास एसएएस नगर, मोहाली सूचना प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी संबंधित उद्योगों के लिए एक आकर्षक गंतव्य स्थान बन गया है। भारत सरकार ने इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन स्कीम (आई.आई.यू.एस.) के तहत लुधियाना में दो परियोजनाओं को मंजूरी दी है। ये परियोजनां बुनाई तथा साइकिल के हिस्से बनाने वाले समूहो से संबद्ध हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य घरेलू उद्योग को सार्वजनिक/निजी भागीदारी के जरिए समूह/स्थानों पर ढांचागत गुणवत्ता उपलब्ध कराकर इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।
सिंचाई
कृषि प्रधोन राज्य होने की वजह से पंजाब में कृषि विकास को उच्च प्राथमिकता दी जाती है। राज्य में उपलब्ध जल यहां की भूमि की उपजाऊ क्षमता से काफी कम है। इसीलिए यहां उत्पादकता बढाने के लिए पानी की हर बूंद को सही ढंग से इस्मेमाल करने पर बल दिया जाता है। पंजाब सरकार भी फसलों के विविधीकरण के लिए अनेक परियोजनाएं चला रही है। पानी के सही इस्तेमाल के कारण राज्य के कपास उत्पादन वाले विभिन्न जिलों में सिंचाई क्षेत्र 0.97 लाख हेक्टेयर बढाया जा सका है। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्र 50.36 लाख हेक्टेयर है जिसमें 42.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती है। राज्य में 33.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नहरों से सिंचाई होती है। नहरों के इस विस्तृत जाल में शामिल मुख्य नहरों तथा उनकी शाखाओं की कुल लंबाई 14,500 किलोमीटर है।
रावी नदी में माधोपुर हेड वर्क्स के आठ किलोमीटर उत्प्रवाह पर बनने वाला रनजीत सागर बांध एक बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजना है। मिट्टी-कंकड चूरे से बनने वाले 160 मीटर ऊंचे इस बांध में 3.48 लाख हेक्टेयर भी को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने की क्षमता है। विश्व बैंक की ऋण सहायता से पंजाब सिंचाई और जल निकासी परियोजना का दूसरा चरण पूरा हो गया है। 1,0920 कि.मी. नालियों के निर्माण, वर्तमान सिंचाई प्रणालियों की सिंचाई क्षमता को बढाया गया है, 33,000 कि.मी. जल संचार प्रणालियों को आकार दिया जा चुका है तथा विश्व बैंक परियोजना के अंतर्गत 295 नं. नहर नियंत्रण करने वाले ढांचों का आधुनिकीकरण पूरा हो चुका है। 1260 कि.मी. जल लंबी नालियों की मरम्मत तथा 53 कि.मी. नई नालियों का निर्माण राज्य निधि से किया गया है। 6 नं. नहर प्रणाली तथा भटिंडा नहर प्रणाली की तीन नहरों की क्षमता को बढाने के लिए 18.83 करोड रूपये की लागत की अनेक परियोजनाएं पूरी कर ली गई है।
रनजीत सागर बांध के पूरा हो जाने पर अतिरिक्त पानी के लिए यू.बी.डी.सी. प्रणाली के पुनर्निर्माण की परियोजना ए.आई.बी.पी. स्कीम के तहत शुरू की गई है। परियोजना के अंतर्गत 364.10 कि.मी. लंबी मुख्य/शाखा नहर के निर्माण कार्य में से 298 कि.मी का कार्य तथा 1,557.25 कि.मी. की नालियों/बिना नाली की जल वितरणियों/छोटी नालियों के निर्माण कार्य में से 1,507 कि.मी. नालियों/बिना नाली की जल वितरणियो/छोटी नालियों के निर्माण का कार्य 140 करोड़ रूपये की लागत से पूरा हो चूका है। यू.बी.डी.सी. परियोजना को जल्दी पूरा करने के लिए बाकी बचे कार्य को युद्धस्तर पर निपटाने के लिए राज्य सरकार ने 20 करोड रूपये की राशि जारी की है। मूल ऊपरी कसूर शाखा के डिजाइन में परिवर्तन करके निचली कसूर शाखा तथा सबरांवों नहर शाखा प्रणाली को पर्याप्त पानी मिलने वाली बाधाओं को दूर कर दिया गया है। जिससे यू.बी.डी.सी. प्रणाली के विस्तृत क्षेत्र को पर्याप्त पानी की आपूर्ति बहाल हो गई है।
बानुर नहर प्रणाली को सदा प्रवाही बनाने का प्रस्ताव नाबार्ड के पास मंजूरी के लिए भेजा गया है। इस पर 38.08 करोड रुपये खर्च होंगे। इसी तरह मुख्य नहर से नालियां निकालने की योजना, जिस पर 39.55 करोड़ रूपये की लागत आएगी, भी नाबर्ड की मंजूरी के अंतर्गत है। इन सबसे ऊपर, बीएमएल नहर प्रणाली, सरहिंद नहर प्रणाली, सरहिंद फीडर प्रणाली, बिस्ट दोआब नहर प्रणाली तथा पूर्वी नहर प्रणाली जैसी नहर प्रणालियों के विभिन्न स्तरों की क्षमतओं को बढाने के लिए 299.22 करोड़ रु. की एक एकीकृत योजना प्रस्तावित की गई है। इसके लिए आवश्यक निधि नाबार्ड द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अंतर्गत 33,000 हेक्टेयर कि.मी. अतिरिक्त क्षेत्र में सिंचाई क्षमता के साथ-साथ 1,98,000 कि.मी. क्षेत्र में सिंचाई के सुविधाओं में सुधार लाने का लक्ष्य रखा गया है।
पंजाब के पिछडे क्षेत्र कांदी का विकास 11 छोटे बांधों के निर्माण से किया गया है। इन बांधों से 12,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। कांदी नहर को निर्माण कार्य पूरा हो जाने के बाद 19,867 हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई करेगी जिससे इस क्षेत्र में हरित क्रांति आ जाएगी। राज्य में 1,615 ट्यूबवैल काम कर रहे हैं। इसके अलावा 3,905 कि.मी. लंबी जल प्रणालियां भी बनाई गई हैं। पंजाब के दक्षिणी भाग में बढते जल-स्तर के प्रभाव को नई नालियां बनाकर, वर्तमान 8000 कि.मी. की नालियों को गहरा करके, 1800 कि.मी. लंबे तटों को चौडा करके तथा 3800 नदी संरक्षण कार्य करके कम किया गया है। ट्यूबवैलो को चालू करके नहर के रिसाव को रोका गया है। सरहिंद फीडर के किनारे-किनारे टयूबवैल बना देने से भी नहरों का रिसाव रोकने में मदद मिली है। राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र में 60 प्रतिशत की सिचांई निजी/ सरकारी ट्यूबवैलों से तथा शेष 40 प्रतिशत की सिंचाई नहरों से होती है।
स्रोत: भारत २००८ – एक संदर्भ वार्षिक ![]()

