हिमाचल प्रदेश
| ब्यौरे | विवरण |
|---|---|
| 55,673 वर्ग कि.मी. | |
| 6,077,900 | |
| शिमला | |
| हिंदी और पहाड़ी |
राज्य सरकार का पोर्टल (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
जिला वेबसाइट
भारत पर तस्वीरों के ढेर सारे खजाने को देखने के लिए चित्र दीर्घा अनुभाग में देखें
इतिहास और भूगोल
हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय के मध्य में स्थित है, जिसे देव भूमि कहते हैं और यह देवी और देवताओं का निवास मानी जाती है। इस पूरे राज्य में पत्थर और लकड़ी के अनेक मंदिर हैं। सम़ृद्ध संस्कृति और परम्पराओं ने हिमाचल को एक अनोखा राज्य बना दिया है। यहां की छायादार घाटियां, ऊंचे नीचे पहाड़, ग्लेशियर और विशाल पाइन वृक्ष और गरजती नदियां तथा विशिष्ट जीव जंतु मिलकर हिमाचल के लिए एक मधुर संगीत रचना तैयार करते हैं।

शिमला
अप्रैल 1948 में इस क्षेत्र की 27,000 वर्ग कि.मी. में फैली लगभग 30 रियासतों को मिलाकर इस राज्य को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। 1954 में जब ‘ग’ श्रेणी की रियासत तबलासपुर को इसमें मिलाया गया, तो इसका क्षेत्रफल बढ़कर 28,241 वर्ग कि.मी.हो गया। सन 1966 में इसमें पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को मिलाकर इसका पुनर्गठन किया गया तो इसका क्षेत्रफल बढ़कर 55,673 वर्ग कि.मी. हो गया। आज हिमाचल प्रदेश को न केवल पहाड़ी क्षेत्रों के विकास का मॉडल माना जाता है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं में इस प्रदेश ने उल्लेखनीय विकास किया है।
कृषि
कृषि हिमाचल प्रदेश का प्रमुख व्यवसाय है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह 69 प्रतिशत कामकाजी आबादी को सीधा रोजगार मुहैया कराती है। कृषि और उससे संबंधित क्षेत्र से होने वाली आय प्रदेश के कुल घरेलू उत्पाद का 22.1 प्रतिशत है। कुल भौगोलिक क्षेत्र 55.673 लाख हेक्टेयर में से 9.79 लाख हेक्टेयर भूमि के स्वामी 9.14 लाख किसान हैं। मंझोले और छोटे किसानो के पास कुल भूमि का 86.4 प्रतिशत भाग है। राज्य में कृषि भूमि केवल 10.4 प्रतिशत है। लगभग 80 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा-सिंचित है और किसान इंद्र देवता पर निर्भर रहते हैं। वर्ष 2006-07 में खाद्यान्न उत्पादन 16 लाख मिलियन टन रहा ।
बागवानी
प्रकृति ने हिमाचल प्रदेश को व्यापक कृषि जलवायु परिस्थितियां प्रदान की हैं जिसकी वजह से किसानों को विविध फल उगाने में सहायता मिली है। बागवानी के अंतर्गत आने वाले प्रमुख फल हैं-सेब, नाशपाती, आडू, बेर, खूमानी, गुठली वाले फल, नींबू प्रजाति के फल, आम, लीची, अमरूद और झरबेरी आदि। 1950 में केवल 792 हेक्टेयर क्षेत्र बागवानी के अंतर्गत था, जो बढ़कर 2.23 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसी तरह,1950 में फल उत्पादन 1200 मीट्रिक टन था, जो 2007 में बढकर 6.95 लाख टन हो गया है। वर्ष 2006-07 के लिए 7 लाख टन फल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है और फल उद्योग से करीब 2200 करोड़ रूपये की सकल घरेलू वार्षिक आय होती है।
दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राज्य में बागवानी के समन्वित विकास के लिए टेक्नोलॉजी मिशन 80 करोड़ रूपये की कुल लागत के साथ स्थापित किया जा रहा है। यह मिशन अंत से अंत तक की अवधारणा पर आधारित है जिसके हित राज्य में बागवानी विकास की सभी तरह की संभावनाओं का पता लगया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत विभिन्न जलवायु वाले कृषि क्षेत्रों में चार उत्कृष्टता केंद्र बनाए जाएंगे और जल संरक्षण, ग्रीन हाउस, कार्बनिक कृषि और कृषि तकनीकों से जुड़ी सभी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
सड़कें
हिमाचल प्रदेश राज्य में यहां की सड़कें ही यहां की जीवन रेखा हैं और ये संचार के प्रमुख साधन हैं। इसके 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से 36,700 किलोमीटर में बसाहट है, जिसमें से 16,807 गांव अनेक पर्वतीय श्रृखलाओं और घाटियों के ढलानों पर फैले हुए हैं। उत्पादन क्षेत्रों और बाजार केंद्रों को जोड़ने वाली सड़कों के निर्माण के महत्व को समझते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार ने अगले तीन वर्षों में हर पंचायत को सड़क से जोड़ने का फैसला किया है। जब यह राज्य 1948 में अस्तित्व में आया, तो यहां केवल 288 कि.मी. लंबी सड़कें थीं जो 15 अगस्त 2007 तक बढ़कर 30,264 हो गई हैं।
जैव प्रौद्योगिकी
जैव प्रौद्योगिकी के महत्व को देखते हुए राज्य में विद्यमान जैव-प्रौद्योगिकी की संभावनाओं के दोहन पर विशषे ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए अलग से जैव-प्रौद्योगिकी विभाग खोला गया है। राज्य ने अपनी जैव-प्रौद्योगिकी नीति तैयार की है। सरकार की तरु से जैव-प्रौद्योगिकी इकाइयों को वही रियायतें दी जा रही हैं जो अन्य औद्योगिकी इकाइयों को मिलती हैं। राज्य सरकार का सोलन जिले में जैव-प्रौद्योगिकी पार्क की स्थापना का प्रस्ताव है।
सिंचाई और जलापूर्ति
साल 2007 तक हिमाचल प्रदेश में कुल बुवाई क्षेत्र 5.83 लाख हेक्टेयर था। गांवों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराई गई और अब तक राज्य में 14,611 हैंडपंप लगाए जा चुके हैं। जल आपूर्ति और सिंचाई क्षेत्रों में सुधार के लिए राज्य सरकार ने 339 करोड़ रूपए की लागत से ‘वाश’ परियोजना आरंभ की है। यह परियोजना सिंचाई तथा पीने के पानी के लिए जी.डी.जेड. के सहयोग से चलाई जा रही है।
वानिकी
राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 55,673 वर्ग किलोमीटर है। वन रिकार्ड के अनुसार कुल वन क्षेत्र 37,033 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 16,376 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहां पहाड़ी चरागाह वाली वनस्पतियां नहीं उगाई जा सकतीं क्योंकि यह स्थायी रूप से बर्फ से ढका रहता है।
संवारने लायक वन क्षेत्र केवल 20,657 वर्ग किलोमीटर है। राज्य सरकार अपनी नई परियोजनाओं के माध्यम से अधिकतम क्षेत्र को हरित पट्टी के दायरे में लाने का प्रयास कर रही है। इसके लिए राज्य सरकार की अपनी, भारत सरकार की और बाहरी यहायता से चल रही परियोजनाओ को क्रियान्वित कया जा रहा है। विश्व बैंक ने मध्य हिमालय में समन्वित जलाशय विकास परियोजना के लिए 365 करोड़ रूपये स्वीकृत किए हैं। यह परियोजना अगले छह वर्षो में 10 जिलों के 42 विकास खंडों की 545 पंचायतों मे क्रियान्वित की जाएगी। राज्य में 2 राष्ट्रीय पार्क और 32 वन्यजीवन अभयारण्य हैं। वन्यजीवन अभयारण्य के अंतर्गत कुल क्षेत्र 5,562 कि.मी., राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत 1,440 कि.मी. है। इस तरह कुल संरक्षित क्षेत्र 7,002 कि.मी. है।
पर्यटन
पर्यटन उद्योग को हिमाचल प्रदेश में उच्च प्राथमिकता दी गई है और हिमाचल सरकार ने इसके विकास के लिए समुचित ढांचा विकसित किया है जिसमें जनोपयोगी सेवाएं, सड़कें, संचार तंत्र हवाई अड्डे यातायात सेवाएं, जलापूर्ति और जन स्वास्थ्य सेवाएं शामिल है। राज्य सरकार राज्य को ‘हर सूरत में गंतव्य’ का रूप देने के लिए कटिबद्ध है। राज्य पर्यटन विकास निगम राज्य की आय में 10 प्रतिशत का योगदान करता है। यह निगम बिक्री कर, सुख-सुविधा कर और यात्री कर के रूप में 2 करोड़ वार्षिक आय का योगदान करता है। वर्ष 2007 में राज्य में 8.3 मिलियन पर्यटक आए जिनमें 2008 लाख विदेशी थे।
राज्य में तीर्थो और नृवैज्ञानिक महत्व के स्थलों का समृद्ध भंडार है। राज्य को व्यास, पाराशर, वसिष्ठ, मार्कण्डेय और लोमश आदि ऋषियों के निवास स्थल होने का गौरव प्राप्त है। गर्म पानी के स्रोत, ऐतिहासिक दुर्ग, प्राकृतिक और मानव निर्मित झीलें, उन्मुक्त विचरते चरवाहे पर्यटकों के लिए असीम सुख और आनंद का स्रोत हैं।
राज्य सरकार स्थायी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निजी क्षेत्र को इस बात के लिए प्रोत्साहित कर रही है कि वह पर्यटन संबंधी ढांचे को इस तरह विकसित करे ताकि राज्य की प्राकृतिक स्थिति और पर्यावरण अक्षुण्ण बना रहे। मुख्य जोर रोजगार सृजन और पर्यटन की अवधारणा को बढ़ावा देने पर है। अतिथियों/पर्यटकों के प्रवास की अवधि बढ़ाने के लिए गतिविधि आधारित पर्यटन के विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है।
पर्यटन की दृष्टि से राज्य के संवर्धन और विकास के लिए राज्य सरकार जिन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है, वे हैं:
- इतिहास संबंधी पर्यटन
- नए क्षेत्रों पर विह्ति करना और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना
- ढांचे का सुधार
- तीर्थ पर्यटन
- आदिवासी पर्यटन
- प्रकृति पर्यटन
- स्वास्थ्य पर्यटन
- साहसिक पर्यटन को प्रोत्साहन
- वन्यजीवन पर्यटन
- सांस्कृतिक पर्यटन
वर्ष 2006-07 के लिए, राज्य में पर्यटन विकास के लिए 6276.38 लाख रुपये का आवंटन है। भारत सरकार ने 8 करोड़ रुपये कुल्लू-मनाली-लाहौल एवं स्पीति तथा लेह मठ परिसर के लिए 21 करोड़ रुपये कांगड़ा, शिमला और सिरमौर क्षेत्र के लिए, 16 करोड़ रुपये बिलासपुर-मंडी और चंबा क्षेत्र के लिए, 30 लाख रूपये मनाली में पर्यटन सूचना केंद्र के निर्माण के लिए स्वीकृत किए हैं। त्योहारों और अन्य बड़े अवसरों के लिए 1,545 परियोजनाओं हेतु 67.57 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है।
स्रोत: भारत २००८ - एक संदर्भ वार्षिक ![]()

