मौखिक पोलिया वैक्सीन
- स्वयंसेवक उन बच्चों को भी पोलियो की बूंदे क्यों पिलाते रहते हैं जो अपेक्षित तीन खुराकें ले चुके हों?
- क्या ओपीवी के सेवन से नपुंसकता आ जाती है?
- क्या नवजात शिशुओं को ओपीवी की बूंदें देनी चाहिए?
- क्या दस्त या अन्य बीमारी वाले शिशु को ओपीवी की बूंदे देनी चाहिएं?
- यदि वैक्सीन भिन्न रंग का हो तो क्या उसमें कोई अंतर होता है?
- क्या भारत में पोलियो वैक्सीन की कुशलता के बारे में कोई समस्या है?
स्वयंसेवक उन बच्चों को भी पोलियो की बूंदे क्यों पिलाते रहते हैं जो अपेक्षित तीन खुराकें ले चुके हों?
हर बच्चे को आयु के पहले वर्ष के दौरान मौखिक पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) की कम से कम तीन नेमी खुराकें लेनी चाहिएं। तथापि, ओपीवी 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं है। जो बच्चे सभी नेमी खुराकें और पल्स पोलियो खुराकें चुके हैं, उन्हें भी यह बीमारी लग सकती है। बच्चों को पोलियो से अपंग हो जाने के जोखिम से पूरी तरह बचाने का एक मात्र उपाय यही है कि वन्य पोलियो वाइरस के संचरण को पूर्णत: बाधित करने के लिए पांच वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को कुछ दिनों तक ओपीवी पिलाया जाए और इसे हर वर्ष कुछ बार दोहराया जाए।
क्या ओपीवी के सेवन से नपुंसकता आ जाती है?
ओपीवी एक अत्यंत सुरक्षित वैक्सीन है और कई दशकों से प्रयोग किया जा रहा है। इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि इससे नपुंसकता आ सकती है।
क्या नवजात शिशुओं को ओपीवी की बूंदें देनी चाहिए?
ओपीवी की बूंदें नवजात शिशुओं को भी दी जा सकती हैं, चाहे उनका जन्म कुछ घंटे पहले ही हुआ हो।
क्या दस्त या अन्य बीमारी वाले शिशु को ओपीवी की बूंदे देनी चाहिएं?
ओपीवी की बूंदें दस्त या अन्य रोगों वाले शिशुओं को भी दी जा सकती हैं क्योंकि ये अन्य औषधियों या एंटीबायोटिक्स के साथ अभिक्रिया नहीं करतीं।
यदि वैक्सीन भिन्न रंग का हो तो क्या उसमें कोई अंतर होता है?
आमतौर पर, मौखिक पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) का रंग गुलाबी होता है। परंतु, कभी-कभी रंग पीला या सफेद भी हो सकता है। सभी वैक्सीन एक जैसे हैं और रंग के इस अंतर से वैक्सीन की गुणता या प्रकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
क्या भारत में पोलियो वैक्सीन की कुशलता के बारे में कोई समस्या है?
पोलियो वैक्सीन विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार द्वारा परीक्षण की कड़ी प्रक्रिया से गुजरा है। वैक्सीन के साथ कोई समस्या नहीं है। तथापि, कभी कभी वैक्सीन की क्षमता या प्रभाविता में कमी आ सकती है, यदि उसे निर्धारित तापमान पर न रखा जाए जो कि राष्ट्रीय प्रोटोकोल है। शीतल श्रृंखला में निर्मित कड़ा अनुशासन और कठोर निगरानी प्रणाली सुनिश्चित करती है कि ऐसा न हो।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल

