- मृदा जांच
- मृदा उर्वरता
- केन्द्रीय मृदा और सामग्री अनुसंधान केन्द्र (सेंट्रल सायल एंड मेंटीरियलस रिसर्च स्टेशन) (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
- केन्द्रीय लवण मृदा अनुसंधान संस्थान (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
- भारतीय मृदा संरक्षण सोसायटी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
- मृदा उर्वरता मैप, हरियाणा (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
- तमिलनाडु के जिलों के मृदा के विवरण (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
मृदा
पृथ्वी की सतह की सबसे ऊपरी परत को मृदा कहते हैं। इसमें विखंडित चट्टानों के छोटे कणों, खनिजों, जैविक पदार्थ और बैक्टीरिया का मिश्रण होता है। मृदा का निर्माण प्रकृति के घटकों जैसे तापमान, वर्षा, हवा, तरंगों, जीवो और पौधों की गतिविधियो द्वारा चट्टानों का विखंडन होता है और धीरे-धीरे वे छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं। देश के सभी भागों मिट्टी की गहराई (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) समान नहीं है। कुछ स्थानों पर मिट्टी कुछ सेंमी गहरी होती है जबकि अन्य स्थानों पर यह 30 मीटर तक हो सकती है।
मृदा की चार परतें होती हैं। पहली अथवा सबसे ऊपरी सतह छोटे-छोटे मिट्टी के कणों और गले हुए पौधों और जीवों के अवशेष से बनी होती है। यह परत फसलों की पैदावार के लिए महत्त्वपूर्ण होती है। दूसरी परत महीन कणों जैसे चिकनी मिट्टी की होती है और तीसरी परत मूल विखंडित चट्टानी सामग्री और मिट्टी का मिश्रण होती है तथा चौथी परत में अ-विखंडित सख्त चट्टानें होती हैं।
भारत में गंगा के तटीय मैदानों की उपजाऊ जलोढ मिट्टी से लेकर दक्कन के पठार की काली और लाल मिट्टी तक पाई जाती है। उदाहरण के लिए यदि आप तमिलनाडु की यात्रा कर रहे है तो आप देख सकते है कि सेलम और पेरियार जिलों में जोते गए खेत लाल रंग के हैं जबकि कोयंबटूर और रायनाथपुरम में काले रंग के खेत हैं।
प्रत्येक प्रकार की मिट्टी अपनी विशिष्ट भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं के माध्यम से विभिन्न प्रकार की फसलों को लाभ प्रदान करती है जलोढ मिट्टी उपजाऊ मिट्टी है जो पोटेशियम से भरपूर है और यह कृषि विशेष कर धान, गन्ना और केले की फसल के लिए बहुत उपयुक्त है। लाल मिट्टी में लौह मात्रा अधिक होती है और यह रेड ग्राम, बंगाल चना, ग्रीन ग्राम, मूंगफली और अरण्डी के बीज की फसल के लिए उपयुक्त है। काली मिट्टी में कैल्शियम, पौटेशियम और मैगनेशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है लेकिन इसमें नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है। कपास, तम्बाकू, मिर्च तिलहन, ज्वार, रागी और मक्के जैसी फसलें इसमें अच्छी उगती हैं। रेतीली मिट्टी में पोषक तत्त्व कम होते हैं लेकिन यह अधिक वर्षा क्षेत्रों में नारियल, काजू और कैजुरिना के पेड़ों के विकास में उपयोगी है।
कई बार कारकों जैसे वायु, बहते पानी, पशुओं द्वारा घास चरने और मनुष्य के निर्माण जैसे क्रियाकलापों से मृदा का अपरदन हो जाता है। इसके साथ साथ, यदि क्षेत्र में एक ही फसल बार-बार उगाई जाती है तो मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो जाती है। ऐसे में मृदा की जांच महत्त्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में उपलब्ध मिट्टी की गुणवत्ता को मृदा जांच प्रयोगशालाओं में जांचा जा सकता है। यहां पर मिट्टी के सैम्पल का विश्लेषण किया जाता है और उन तत्त्व के बारे में सिफारिश की जाती है जिनकी मिट्टी को उपयुक्त बनाने के लिए आवश्यकता है। अच्छी मिट्टी होना कृषि के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। उच्च उत्पादकता और अच्छी उपज केवल तभी प्राप्त की जा सकती है यदि फसल विशेष के लिए सही प्रकार की मिट्टी का उपयोग किया गया हो। जिन क्षेत्रों में उपयुक्त मिट्टी उपलब्ध नहीं है वहां पर इसे उपजाऊ बानाने के लिए इसमें उर्वरक के रूप में पोषक तत्त्व मिलाए जा सकते है। यह ध्यान में रखते हुए सरकार ने देशभर में बड़ी संख्या में मृदा जांच प्रयोगशालायें स्थापित की हैं। अधिक जानकारी के लिए निम्नवत् लिंक्स पर जाएं।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल
