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भण्‍डारण, विपणन एवं मूल्‍य निर्धारण

कृषि जिन्‍सों का भण्‍डारण, मूल्‍य निर्धारण एवं विपणन उत्‍पादन की प्रक्रिया की तरह उच्‍च लाभों के लिए महत्‍वपूर्ण है। यही वजह है कि सरकार ने 1951 से विभिन्‍न पंच वर्षीय योजनाओं के माध्‍यम से भौतिक व्‍यापार खेतों पर तथा खेतों से बाहर भण्‍डारण, मूल संरचना, मानकीकरण एवं स्‍तरीकरण के लिए सुविधाओं, पैकेजिंग और पविहन के विकास पर जोर दिया हैं।

उपयुक्‍त भण्‍डारण सुविधाओं के अभाव के कारण कीटों एवं अन्‍य जीवों द्वारा आक्रमण किया गया हैं। ऐसी जन्‍तु बाधा से हुई क्षति के कारण क्षति की सीमा के अधीन बाजार मूल्‍य में कमी आती है। कुछ मामलों में उत्‍पाद को उपयोग हेतु अनुपयुक्‍त घोषित कर दिया जाता है एवं उसे नष्‍ट करना पडता हैं। इसके फलस्‍वरूप किसानों को भारी क्षति उठानी पडती है। समझदार किसान अपने कृषि उत्‍पादों को सावधानी पूर्वक भण्‍डारण करने के लिए उपाय करने चाहिए ताकि बाजार में अधिकतम कीमत प्राप्‍त की जा सकें।

अधिकतर कृषि जिन्‍स बाजार नियमित मांग एवं आपूर्ति की नियमित ताकतों के अधीन कार्य करती हैं। सरकार कुछ फसलों के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य अथवा संबंधित मूल्‍य भी निर्धारित करती है ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके तथा उत्‍पादन बढाने के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित किया जा सकें। यदि इन जिन्‍सों की कीमत समर्थन सीमा से नीचे गिरती है तो सरकार राज्‍य खाते में इन फसलों को खरीदने की व्‍यवस्‍था करती हैं।

सरकार भारत में एक विनियमित बाजार प्रणाली के माध्‍यम से कृषि उत्‍पादों के सुंसगठित विपणन का समर्थन करती है। इन भौतिक बाजारों का आशय यह सुनिश्चित करने से है कि किसान ईमानदारी का माहौल बना करके उचित लाभ प्राप्‍त कर सकें। यह ईमानदारी मांग तथा आपूर्ति की ताकतों, बाजार व्‍यवहारों के विनियमन तथा लेन-देन में पारदर्शिता से संबंधति होता हैं।

यहां स्‍थानीय भण्‍डारण भण्‍डागारों, विपणन नेटवर्कों तथा सामग्री कीमतों के बारे में कुछ सूचना है जिससे आपके कृषि उत्‍पाद के लिए अच्‍छे मूल्‍य प्राप्‍त करने में मदद मिलेगी।

बाजार की दिशा

कृषि जिन्‍सों के क्रय एवं विक्रय की एक कारगर प्रणाली प्राप्‍त करने के लिए अधिकतर राज्‍य सरकारों एवं संघ शासित क्षेत्रों ने कृषि उत्‍पाद बाजारों के विनियमन के लिए व्‍यवस्‍था करने हेतु कृषि उत्‍पाद विपणन समिति जैसे विधानों को अधिनियमित किया है। इन विनियमित भौतिक बाजारों की स्‍थापना इसलिए की गई है। ताकि कृषकों को अपनी फसलों एवं अन्‍य कृषि उत्‍पादों के लिए लाभ की मुनासिब राशि सुनिश्चिम की जा सकें।

आजादी के समय भारत में लगभग 286 विनियमित बाजार थे। इस समय, देश में 7500 से अधिक ऐसे बाजार हैं। इनमें से अधिकतर विनियमित बाजार थोक़ बाजार हैं। इन बाजारों के अलावा, लगभग 30000 ग्रामीण आवधिक बाजार हैं जिनमें से 15 प्रतिशत विनियमन की परिधि के अंतर्गत काम करते हैं। वर्तमान में एकल विनियमित बाजार की औसत पहुंच 459 वर्ग कि.मी हैं। इसका अर्थ यह है कि किसानों को यह सुविधा प्राप्‍त करने के लिए काफी लम्‍बी दूरी तय करनी पडती है।

80 प्रतिशत से अधिक बाजारों में आंतरिक सडकों, चार दीवारी विद्युत प्रकाश, चढाने एवं उतारने की सुविधा तथा माप-तोल उपस्‍कर जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। किसानों के विश्राम गृह आधे से अधिक विनियमित बाजारों में हैं। सरकार जिन मूलभूत ढांचे को सभी विनियमित बाजारों तक पहुंचाना चाहती है वे है, नीलामी मंच, शोषक प्रांगण एवं शीत भण्‍डार इकाइयां हैं।

यह राज्‍यवार मंडियों की एक व्‍यापक सूची हैं। (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)

स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल